Shakuntla ka Putra Bharat-शकुंतला का पुत्र जिसने शेर का मुंह खोल दांत गिने थे |

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Shakuntla ka Putra Bharat
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दुष्यंत बहुत वीर और पराक्रमी राजा थे,उन्हें शिकार का बहुत शौक था | एक बार वह शिकार खेलते खेलते ऋषि कण्व के आश्रम में पहुँच गये | वहां उन्होंने शकुन्तला को देखा तो देखते ही रह गये वह अत्यंत सुन्दर थी | शकुन्तला अप्सरा मेनका और ऋषि विश्वामित्र की पुत्री थी | ऋषि कण्व ने ही उसका पालन पोषण किया था वह उनके आश्रम में ही रहती थी | Shakuntla ka Putra Bharat-शकुंतला का पुत्र भरत

राजा दुष्यंत ने वही आश्रम में उससे गान्धर्व-विवाह कर लिया था उस समय ऋषि कण्व आश्रम में नही थे | राजा दुष्यंत कुछ दिन वहीं आश्रम में शकुन्तला के साथ रहे और थोड़े समय बाद वह अपने राज्य वापस जाने लगे तो उन्होंने चलते समय शकुन्तला को एक अंगूठी भेट की जो उनके विवाह की निशानी थी | राजा ने चलते चलते शकुन्तला से कह कर विदा लि की ऋषि कण्व के आने के बाद उनसे आज्ञा लेकर उनके पास आ जाये |

कुछ दिन बाद जब ऋषि कण्व वापस आये तो शकुन्तला ने ऋषि को सारी बात बताई तो ऋषि बहुत प्रसन्न हुए और शकुन्तला को राजा दुष्यंत के पास अपने शिष्यों संग भेजा |

लेकिन राजा दुष्यंत ने उन्हें पत्नी मानने से इंकार कर दिया क्योकि शकुन्तला ने दुष्यंत द्वारा भेट में दी गई अंगूठी कही खो दी थी | वह अंगूठी शकुन्तला से स्नान करते वक्त वहीं नदी में गिर गई | अंगूठी के बिना राजा ने उन्हें पहचानने से मना कर दिया | निराश शकुन्तला राजभवन से लौट आई और एक वैन में आश्रम बनाकर रहने लगी वह वापस ऋषि कण्व  के पास भी नही गई |

उस आश्रम में रहते हुए शकुन्तला ने एक बालक को जन्म दिया जिसका नाम था “भरत” | भरत बचपन से ही बहुत बहादुर और साहसी था.वह हिंसक पशुओ के साथ खेलता था, Shakuntla ka Putra Bharat बड़े बड़े शेरो की सवारी करना उसका शौक था | वह खेल खेल में शेर के मुंह में हाथ डाल कर उसके दांत गिनता था | वह शेरनी के बच्चो की ही भांति शेरनी का दूध पीता था |

इसी कारण सभी लोग उसे सर्वदमन  कहकर भी पुकारते थे | एक ऋषि ने उसके गले में एक ताबीज बांधा था और कहा की जो भी इस ताबीज को छु लेगा यह सांप बनकर उसे डस लेगा |

वहीं दूसरी तरफ राजा दुष्यंत को एक दिन शकुन्तला की  गुम हुई अंगूठी मिल गई,उस अंगूठी को एक मछली निगल गई थी जो की एक मछुआरे के जाल में आकर फस गई थी और जब उसे काटा गया तो उसके पेट से राजा की अंगूठी निकली,और उस अंगूठी को मछुआरे ने राजा को सौंप दिया जिसे देखकर राजा को शकुंतला की याद आई |

अंगूठी मिलने के बाद राजा दुष्यंत शकुंतला को खोज में निकल पड़े | संयोग से राजा उसी आश्रम में पहुँच गये जहाँ पर शकुंतला रह रही थी | राजा ने वहां पर एक बालक को हिंसक शेरो के साथ खेलते हुए देखा राजा उसे देख कर हैरान रह गये |

राजा दुष्यंत ने ऐसे साहसी बालक को पहले कभी नही देखा था,उस बालक के चेहरे पर अद्भुत तेज था | खेल खेल में बालक के गले का ताबीज खुल कर वही जमिनपर गिर गया | राजा ने आगे बढ़कर ताबीज उठाया और बालक के गले में बांध दिया यह देखकर आश्रम में मौजूद सभी लोग हैरान रह गये की ताबीज को छुने पर भी उन्हें कुछ क्यों नही हुआ |

Shakuntla ka Putra Bharat दुष्यंत ने बालक से उसका परिचय पूछा – “बालक तुम कौन हो ? तुम्हारे माता पिता कौन है ?

बालक ने ऊँचे स्वर में जवाब दिया – “मै देवी शकुंतला का पुत्र हूँ मेरा नाम भरत है” बालक का जवाब सुनकर राजा थोडा प्रसन्न हुए |

फिर उन्होंने बालक से उसके पिता के बारे में पूछा तो बालक ने फिर से ऊँचे स्वर में कहा “पिता की उन्हें कोई जरूरत नही,पिता की जरूरत उन्हें पड़ती है जो अपने पैरो पर खड़े नही हो सकते”|

तभी वहां शकुंतला आ पहुंची और राजा दुष्यंत को देख उनके चरणों को नमन किया,उसके बाद उन्होंने भरत को बताया कि यह वीर और पराक्रमी राजा दुष्यंत ही तुम्हारे पिता है | दुष्यंत ने यह सुनकर बालक को सीने से लगा लिया और उसके बाद अपनी पत्नी और बालक भरत को लेकर वापस नगर आ गये |

दुष्यंत के बाद भरत राजा बने | वह भी अपने पिता दुष्यंत की भांति ही बहुत वीर,दयालु,न्यायप्रिय और पराक्रमी राजा बने | भरत ने कई वर्षो तक राज्य किया | आगे चलकर महान राजा भरत के नाम पर ही हमारे देश भारत का नाम पड़ा |

Shakuntla ka Putra Bharat-शकुंतला का पुत्र भरत

“भारत माता की जय”

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