Mitra Ki Salah ki Kahani-सच्चे मित्र की सलाह देखिए कैसे काम आती है

2
Mitra Ki Salah ki Kahani
Mitra Ki Salah ki Kahani
Share with your friends :-

दोस्तों आज की कहानी का शीर्षक है Mitra Ki Salah ki Kahani और आज की कहानी में हम जानेंगे, कैसे एक व्यक्ति अपने मित्र को एक ऐसी अच्छी सलाह देता है जिससे उसके मित्र का जीवन ही बदल जाता है और वह सुखी और संपन्न जीवन व्यतीत करता है।

Mitra Ki Salah ki Kahani – सच्चे मित्र की सलाह देखिए कैसे काम आती है

दुर्गादास था तो धनी व्यक्ति लेकिन बहुत ही आलसी था। वह न तो अपने खेत देखने जाता था, न ही खलिहान जाता था, इसी के साथ वह अपने गाय-भैसों की भी खोज-खबर नही लेता था। यहाँ तक की वह इतना आलसी था कि अपने घर के सामानों की भी देख-रेख नही करता था, उसने सारा कार्य अपने नौकरों पर छोड़ रखा था।

उसके आलस और कुप्रबंध से घर की सारी व्यवस्था बिगड़ गई थी। उसको खेत में हानि होने लगी थी। दूसरी तरफ गाय-भैसों के दूध-घी से भी कुछ ख़ास लाभ नही हो रहा था।

Mitra Ki Salah ki Kahani एक दिन दुर्गादास का दोस्त रामेश्वर उसके घर आया उससे मिलने आया लेकिन घर आकर उसने जब घर की व्यवस्था देखी कि घर का तो बड़ा ही बुरा हाल है। उसने घर का हाल देखते ही समझ लिया की आलसी दुर्गादास को समझाने से वह अपना स्वभाव कभी नही बदलेगा।

रामेश्वर ने अपने मित्र दुर्गादास की भलाई करने के लिए उससे कहा-‘ मित्र ! तुम्हारी विपत्ति देख मुझे बड़ा ही दुःख हो रहा है। तुम्हारी इस दरिद्रता को देखकर इसे दूर करने का मैं एक उपाय जानता हूँ।

मित्र रामेश्वर की बात सुनकर दुर्गादास ने कहा-‘ कृपा करके वह उपाय मुझे बताओ मित्र मैं उसे अवश्य करूँगा।

रामेश्वर ने कहा-‘ मित्र मैंने सुना है मानसरोवर में रहने वाला एक सफ़ेद हंस का जोड़ा है जो सभी पक्षियों के भी जागने से पहले पृथ्वी पर घुमने आता है और भोर होने से पहले ही वापस मानसरोवर में चला जाता है लेकिन उसके आने का समय कोई निश्चित नही है लेकिन वह भोर होने से पहले ही रात्रि के तीसरे-चौथे पहर लौट जाता है। Mitra Ki Salah ki Kahani

बुजुर्गो का मानना है कि उनके दर्शन करने मात्र से ही व्यक्ति की सभी दरिद्रता और सभी विपत्ति का नाश हो जाता है और व्यक्ति का जीवन सुखमय हो जाता है।

मित्र रामेश्वर की यह बात सुनकर दुर्गादास बोला-‘कुछ भी हो जाये लेकिन मैं उन हंसो के दर्शन अवश्य करके रहूँगा। दुर्गादास को यह बात कहकर रामेश्वर वहां से चला गया।

अब दुर्गादास अगली सुबह जल्दी उठा और हंसो की खोज में वह बाहर निकला, हंसो की खोज में वह खलिहानों में गया वहां जाकर देखा, एक व्यक्ति उसके खलिहानों से गेहूं के ढेर से गेहूं चुरा रहा था।

Mitra Ki Salah ki Kahani  दुर्गादास ने उसे देखकर उसे चेताया और उसे डांटने लगा कि मेरे खलिहानों से गेहूं क्यों चुरा रहे हो? दुर्गादास को सामने देख गेहूं चोरी करने वाला व्यक्ति उसे देखकर लज्जित हो गया और उससे क्षमा मांगने लगा साथ ही आगे से कभी चोरी न करने का वादा कर वह व्यक्ति वहां से चला गया।

अब दुर्गादास खलिहान से घर लौट आया और गौशाला में गया। गौशाला की देखरेख करने वाला गाय का दूध दुह कर चुपचाप अपनी पत्नी को दे रहा था बदलने में कुल दूध में उतना ही पानी मिलाने जा रहा था।

यह सब देखकर दुर्गादास आग-बबूला हो गया और जोर से गौशाला की देखरेख करने वाले पर चिल्लाया और बोला-‘यह क्या कर रहे हो?’ यही कारण है कि अब दूध-घी से हमे लाभ नही हो रहा है। अपनी भूल को स्वीकारते हुए उस व्यक्ति ने माफ़ी मांगी।

गौशाला के बाद अब वह खेतो की तरफ निकल पड़ा। उसने खेत पर जाकर देखा दिन चढ़े तक खेत में मजदूर नही आये थे, वह वही रुक कर उनका इंतजार करने लगा। कुछ देर बाद जब मजदूर आये तो उन्हें देर से आने का उलाहना देकर आगे से जल्दी आने के लिए उसने सभी मजदूरो को कहा। Mitra Ki Salah ki Kahani

इस प्रकार वह हंसो की खोज में जहाँ-जहाँ गया उसने हर जगह जाकर अपनी किसी न किसी को होने से रोका।

अब सफ़ेद हंसो की खोज में दुर्गादास प्रतिदिन सवेरे जल्दी उठने लगा और घुमने लगा। अब उसके नौकर ठीक से काम करने लगे, उसके यहाँ चोरी होना बंद हो गई। पहले वह रोगी रहता था लेकिन अब उसका स्वास्थ्य भी ठीक था।

जिन खेतो में उसे दस मन अन्न मिलता था उन्ही खेतो से अब उसे पच्चीस मन अन्न मिलने लगा। अब गौशाला से होने वाले दूध और घी से भी उसे अधिक लाभ मिलने लगा। यह सब होता देख दुर्गादास बहुत प्रसन्न था।

Mitra Ki Salah ki Kahani  एक दिन फिर दुर्गादास का मित्र रामेश्वर उससे मिलने उसके घर आया और दुर्गादास से बोला-‘कहो मित्र कैसे हो? सब ठीक तो है। रामेश्वर से बड़ी ही प्रसन्नता से दुर्गादास बोला-‘ईश्वर की कृपा से सब ठीक है। मित्र ! सफ़ेद हंस तो मुझे आज तक नही दिखे लेकिन उनकी खोज में मुझे बहुत लाभ हुआ है।

रामेश्वर दुर्गादास की बात सुनकर हँस पड़ा और बोला-‘मित्र ! परिश्रम करना ही वह सफ़ेद हंस है। परिश्रम के पर सदा उजले होते है। जो व्यक्ति अपना सारा कार्य नौकरों पर छोड़ देता है वह हानि उठाता है और जो व्यक्ति स्वयं परिश्रम करता है वह सदा संपत्ति और सम्मान पाता है।

2 COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here