Maharaja Chhatrasal Kaun the आखिर क्यों उनसे औरंगजेब का हर सैनिक डरता था ?

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आज मै आपको महाराजा छत्रसाल के किशोर अवस्था की एक रोचक कहानी के बारे में बताने वाला हूँ,बहुत से लोगो को इनके बारे में नही पता और वो नही जानते की Maharaja Chhatrasal Kaun the महाराजा छत्रसाल कौन थे ? महाराजा छत्रसाल जो की भारत के मध्ययुग के एक महान प्रतापी योद्धा थे जिन्होने मुगल शासक औरंगजेब को युद्ध में पराजित करके बुन्देलखण्ड में अपना राज्य स्थापित किया और ‘महाराजा‘ की पदवी प्राप्त की।

Maharaja Chhatrasal Kaun the  कौन थे ?

छत्रसाल का जन्म मई 1649 में मोर पहाड़ी के जंगलो में हुआ था,उनके पिता चंपतराव पन्ना के राजा थे उन दिनों वह शाहजहाँ के डर से वनों में भटक रहे थे | शाहजहाँ की सेना अक्सर ही उनका पता करने में लगी रहती थी और उन्हें जिन्दा या मुर्दा पकड़ने के आदेश का पालन कर रही थी |

कहते है इस भाग-दौड़ में एक बार छत्रसाल कही छूट गये थे जिसके बाद उन्हें ढूंढा गया और उसके उपरांत उनके पिता ने उन्हें उनके नाना के पास भेज दिया | पांच वर्ष की आयु तक छत्रसाल अपने नाना के यहाँ ही रहे | दुश्मनों की चिंता दूर होते ही उनके पिता ने उन्हें अपने पास बुला लिया |

तीन वर्ष पिता के पास रहने के बाद छत्रसाल अपने चाचा सुजानराव के साथ चले गये | सुजानराव एक अनुभवी और कुशल सैनिक थे,उन्होंने बचपन से ही छत्रसाल को भी सैनिक शिक्षा देनी शुरू कर दी | कुछ ही समय में छत्रसाल एक वीर,साहसी,कुशल और योग्य सैनिक बन गये | वह तलवार चलाने,भाला चलाने और घुड़सवारी में निपुण हो गये |

छत्रसाल Maharaja Chhatrasal Kaun the में स्वाभिमान कूट कूट कर भरा था,उनसे अपने देश,जाती और हिन्दू धर्म का अपमान सहन नही होता था| छत्रसाल अभी तेरह वर्ष के ही थे तबी उनके पिता चंपतराव का स्वर्गवास हो गया था| तब चाचा सुजानराव ने छत्रसाल को गद्दी पर बैठाया | छत्रसाल ने भी अपने व्यवहार और कर्तव्य निष्ठां से प्रजा को मोहित कर लिया था | उनकी प्रजा उन्हें प्राणों से ज्यादा चाहने लगी थी,और उनका भी अपनी प्रजा पर अटूट विश्वास था |

उन्ही दिनों औरंगजेब दिल्ली की गद्दी पर बैठा था,वह कट्टर मुसलमान था | उसने अनेको मन्दिर तुडवा दिए थे और उनकी जगह मस्जीदे बनवा दी थी | उसके अत्याचारों से सभी बहुत परेशान थे |

एक बार औरंगजेब के कुछ सैनिक विन्ध्वासिनी माता के मंदिर को तोड़ने के लिए आये | वे घोड़े पर सवार थे,रास्ते में उन्हें छत्रसाल मिल गये| छत्रसाल ने आगे बढ़कर उनसे पूछा “तुम लोग कौन हो और कहा जाना चाहते हो ?”

एक घुड़सवार ने उन्हें उत्तर देने के बजाये उनसे ही सवाल कर दिया कि “यहाँ विन्ध्वासिनी का मंदिर कहाँ है ?”

इतना सुनकर छत्रसाल बोले “वहां क्या करोगे ? क्या तुम्हे देवी की पूजा करनी है?’  Maharaja Chhatrasal Kaun the

छत्रसाल का जवाब सुनकर सैनिक बोला “छि: हम किसी देवी की पूजा नही करते,बल्कि हम तो उस विन्ध्वासिनी मंदिर जो तोड़ने आये है”| हम दिल्ली के बादशाह औरंगजेब के सिपाही है हमे बादशाह ने आदेश दिया है की जाकर विन्ध्वासिनी  मंदिर को तोड़ दो|

इतना सुनकर बालक छत्रसाल गुस्से से लाल हो गये और बोले “बकवास बंद करो और अगर अपनी जान की खैरियत चाहते हो तो लौट जाओ नही तो मै तुम्हे अभी खत्म कर दूंगा और इतना कहकर छत्रसाल ने अपनी तलवार निकल ली|

उन्हें गुस्से में देख सैनिक उन्हें बालक समझ कर उनसे युद्ध करने को ललकारने लगे| देखते देखते भीषण युद्ध होने लगा | छत्रसाल ने अकेले ही औरंगजेब के कई सैनिको को मौत के घाट उतार दिया उनके इस रूप को देखकर बाकि सैनिक इतना भयभीत हो गये कि युद्ध छोड़कर भाग खड़े हुए |

जब यह समाचार उनके चाचा और बाकि मंत्रीगण को पता चला तो सभी उनकी वीरता से बहुत प्रसन्न हुए | उस समय उनकी आयु मात्रा चौदह वर्ष थी | Maharaja Chhatrasal Kaun the बड़े होकर छत्रसाल ने अनेको युद्ध में विजय पताका लहराई और दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए | औरंगजेब के सैनिक तो उनसे इतने भयभीत हो गये थे की उनके नाम तक से कांपने लगते थे |

बताया जाता है कि एक बार कवी भूषण की पालकी उठाने के लिए छत्रसाल ने भी अपना कन्धा लगाया था| तब भूषण यह कह उठे थे कि छत्रसाल और शिवाजी में से किसके गुणों का बखान करूं|

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