Hans or Kauve ki Kahani – हंस और कौवे की अत्यंत रोचक कहानी

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Hans or Kauve ki Kahani in Hindi
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दोस्तों आज की कहानी की अगर मैं बात करूँ तो आज की हमारी कहानी है Hans or Kauve ki Kahani in Hindi – हंस और कौवे की अत्यंत रोचक कहानी कहानी में एक कौवा अत्यंत घमंडी होता है और वह घमंड में चूर होकर दूर उड़ने वाले हंसो से प्रतियोगिया करता है लेकिन कहानी में ऐसा क्या होता है कि उसे हंसो से माफ़ी मांगनी पड़ती है चलिए कहानी के द्वारा जानते है:-

Hans or Kauve ki Kahani in Hindi – हंस और कौवे की अत्यंत रोचक कहानी

समुद्र तट के किसी नगर में एक धनवान् वैश्य के पुत्रों ने एक कौआ पाल रखा था । वे उस कौए को बराबर अपने भोजन से बचा अन्न देते थे उनकी जूँठन खाने वाला वह कौआ स्वादिष्ट तथा पौष्टिक भोजन खाकर खूब मोटा हो गया था । इससे उसका अहंकार बहुत बढ़ गया । वह अपने से श्रेष्ठ पक्षियों को भी तुच्छ समझने और उनका अपमान करने लगा ।

एक दिन समुद्रतट पर कहीं से उड़ते हुए आकर कुछ हंस उतरे। वैश्य के पुत्र उन हंसों की प्रशंसा कर रहे थे , यह बात कौए से सही नहीं गयी । वह उन हंसों के पास गया और उसे उनमें जो सर्वश्रेष्ठ हंस प्रतीत हुआ , उससे बोला- ‘ मैं तुम्हारे साथ प्रतियोगिता करके उड़ना चाहता हूँ। Hans or Kauve ki Kahani in Hindi

हंसों ने उसे समझाया- ‘ भैया ! हम तो दूर – दूर उड़ने वाले हैं । हमारा निवास मानसरोवर यहाँ से बहुत दूर है । हमारे साथ प्रतियोगिता करने से तुम्हें क्या लाभ होगा । तुम हंसों के साथ कैसे उड़ सकते हो ?

कौए ने गर्व में आकर कहा- ‘ मैं उड़ने की सौ गतियाँ जानता हूँ और प्रत्येक से सौ योजन तक उड़ सकता हूँ । ‘ उड्डीन , अवडीन , प्रडीन , डीन आदि अनेकों गतियों के नाम गिनाकर वह  कौआ बोला- ‘ बतलाओ , इनमें से तुम किस गति से उड़ना चाहते हो ? ‘

तब श्रेष्ठ हंसने कहा- ‘ काक ! तुम तो बड़े निपुण हो । परंतु मैं तो एक ही गति जानता हूँ , जिसे सब पक्षी जानते हैं । मैं उसी गति से उड़ेगा । ‘ गर्वित कौए का गर्व और बढ़ गया ।

Hans or Kauve ki Kahani in Hindi वह बोला – ‘ अच्छी बात , तुम जो गति जानते हो उसी से उड़ो । ‘ उस समय कुछ पक्षी वहाँ और आ गये थे । उनके सामने ही हंस और कौआ दोनों समुद्र की ओर उड़े ।

समुद्र के ऊपर आकाश में वह कौआ नाना प्रकार की कलाबाजियाँ दिखाता पूरी शक्ति से उड़ा और हंस से कुछ आगे निकल गया । हंस अपनी स्वाभाविक मन्द गति से उड़ रहा था । यह देखकर दूसरे कौए प्रसन्नता प्रकट करने लगे ।

थोड़ी देर में ही कौए के पंख थकने लगे । वह विश्राम के लिये इधर – उधर वृक्ष युक्त द्वीपों की खोज करने लगा । परंतु उसे उस अनन्त सागर के अतिरिक्त कुछ दीख नहीं पड़ता था । इतने समय में हंस उड़ता हुआ उससे आगे निकल गया था ।

कौएकी गति मन्द गयी । वह अत्यन्त थक गया और ऊँची तरंगों वाले भयंकर जीवों से भरे समुद्र की लहरों के पास गिरने की दशा में पहुँच गया । हंस ने देखा कि कौआ बहुत पीछे रह गया है तो रुक गया । Hans or Kauve ki Kahani in Hindi

उसने कौए के समीप आकर पूछा- ‘ काक ! तुम्हारी चोंच और पंख बार – बार पानी में डूब रहे हैं । यह तुम्हारी कौन – सी गति है ? ‘ हंस की व्यंगभरी बात सुनकर कौआ बड़ी दीनता से बोला- ‘ हंस ! हम कौए केवल काँव – काँव करना जानते हैं । हमें भला दूर तक उड़ना क्या आये ।  

मुझे अपनी मूर्खता का दण्ड मिल गया । कृपा करके अब मेरे प्राण बचा लो ‘ जल से भीगे , अचेत और अधमरे कौए पर हंस को दया आ गयी । पैरों से उसे उठाकर हंसने पीठ पर रख लिया और उसे लादे हुए उड़कर वहाँ आया जहाँ से दोनों उड़े थे । हंसने कौए को उसके स्थान पर छोड़ दिया ।

कौए ने अपने प्राण बचाने के लिए हंस का धन्यवाद किया और आगे से कभी घमंड न करने का प्रण भी किया । हंस ने हँसकर कौवे का धन्यवाद लिया और अपनी आगे की यात्रा पर निकल पड़े । Hans or Kauve ki Kahani in Hindi

 

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