Chhatrapati Shivaji ki kahani – छत्रपति शिवाजी महाराज और वीर बालक की कहानी

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Chhatrapati Shivaji ki kahani
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भारत देश में शायद ही कोई हो जो “छत्रपति शिवाजी महाराज” को न जानता हो भारत देश का बच्चा बच्चा शिवाजी महाराज के नाम को आदर से लेता है शिवाजी महाराज ने महाराष्ट्र सहित भारत देश के लिए बहुत सारे कार्य किये है तो आज मैं आपको Chhatrapati Shivaji ki kahani – छत्रपति शिवाजी महाराज और वीर बालक की कहानी बताने जा रहा हूँ

Chhatrapati Shivaji ki kahani – छत्रपति शिवाजी महाराज और वीर बालक की कहानी

एक बार छत्रपति शिवाजी महाराज जब रात्रि के समय अपने कक्ष में सो रहे थे। एक तेरह-चौदह वर्ष का बालक किसी प्रकार चुपचाप से पहले से ही उस कमरे के भीतर घुस आया था और छिपकर वही रात्रि होने का इंतजार कर रहा था।उसने शिवाजी को मारने के लिए तलवार निकाली और जैसे ही चलाने की कोशिश की तभी पीछे से ताना जी ने उसका हाथ पकड़ लिया।

ताना जी छत्रपति शिवाजी महाराज के विश्वासपात्र साथ ही उनकी सेना के सेनापति थे। ताना जी ने उस लड़के को कक्ष में प्रवेश करते पहले ही देख लिया था किन्तु वह देखना चाहते थे कि यह क्या करने के लिए आया है और वह उसे देखने उसके पीछे- पीछे आए थे।

शिवाजी की नींद टूट गई उन्होंने बालक से पूछा-“तुम कौन हो? यहां क्यों आए?

बालक ने कहा-“मेरा नाम मालोजी है, मैं आप की हत्या करने आया था। Chhatrapati Shivaji ki kahani 
शिवाजी-“तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो?
मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है या फिर मैंने तुम्हारी कौन सी हानि की है?

बालक बोला-“आपने मेरी कोई हानि नहीं की है लेकिन मेरी माता कई दिनों से भूखी है। हम बहुत गरीब हैं। आपके शत्रु सौभाग्य राय ने मुझे कहा था यदि मैं आप को मार डालूं, तो वह मुझे बहुत सारा धन देंगे।

तानाजी बोले-“दुष्ट लड़के! धन के लोभ से तू महाराष्ट्र के उद्धारकर्ता का वध करना चाहता था। अब मरने को तैयार हो जा।”

बालक तनिक भी डरा नहीं उसने तानाजी के बदले शिवाजी से कहा-“महाराज ! मैं मरने से डरता नहीं हूं, मुझे अपने मरने की कोई चिंता नहीं है लेकिन मेरी मां बीमार है और उसने कई दिनों से खाना नहीं खाया है वह बहुत भूखी है। वह मरने को पड़ी हुई है।

आप मुझे एक बार घर जाने दीजिए माता के चरणों को प्रणाम करके मैं फिर वापस आपके पास लौट आऊंगा। मैंने आप को मारने का यत्न किया है अब आप मुझे मार डालें यह तो ठीक ही है परंतु मुझे थोड़ा समय दीजिए।

Chhatrapati Shivaji ki kahani तानाजी ने कहा-“तू हमें बातों से धोखा देकर भाग नहीं सकता। बालक बोला- “मैं नही भागूँगा मैं मराठा हूं मराठा झूठ नहीं बोलता। शिवाजी महाराज ने उसे जाने की आज्ञा दे दी और बालक घर गया।

अगले दिन सवेरे जब छत्रपति शिवाजी महाराज दरबार में सिंहासन पर बैठे थे, द्वारपाल ने आकर सूचना दी कि एक बालक महाराज के दर्शन करना चाहता है। बालक बुलाया गया वह वही मालोजी था मालो जी ने दरबार में आकर छत्रपति शिवाजी महाराज को प्रणाम किया और बोला- “महाराज ! मैं आपकी उदारता का आभारी हूं। माता का दर्शन कर आया हूँ। अब आप मुझे मृत्यु दंड दे।”

छत्रपति शिवाजी सिंहासन से उठे। उन्होंने बालक को हृदय से लगा लिया और कहा- “यदि तुम्हारे जैसे वीर एवं सच्चे लोगों को प्राण दंड दे दिया जाएगा तो देश में रहेगा कौन? तुम्हारे जैसे बालक ही तो महाराष्ट्र के भूषण हैं।”

बालक मालो जी शिवाजी महाराज की सेना में नियुक्त हो गया छत्रपति ने उसकी माता की चिकित्सा के लिए राज्य वैद्य को भेजा और बहुत सा धन उपहार में भेज दिया और उसकी माँ के लिए उचित उपचार की व्यवस्था कर दी। Chhatrapati Shivaji ki kahani 

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