Atithi Satkar – अतिथि सत्कार – अतिथि साक्षात भगवान का रूप होता है |

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Atithi satkar
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हमारा देश भारत विभिन्न प्रकार की संस्कृति और परमपराओ के लिए जाना जाता है  हमारे देश में,पत्थर से लेकर नदियों तक को पूजा जाता है हमारे देश में गाय को माता कहा जाता है ऐसे ही बहुत से ऐसे तथ्य है जो भारत को विश्व में एक अलग पहचान देते है | भारत की एक और ख़ास बात है की भारत में अतिथि अर्थात मेहमानों को साक्षात भगवान का दर्जा दिया जाता है तो आज मैं आपको Atithi Satkar – अतिथि सत्कार को लेकर एक कहानी बताने जा रहा हूँ जो आपको जरुर पसंद आएगी|

Atithi Satkar – अतिथि सत्कार

चिड़ियों को फंसा कर उन्हें बेचने वाला एक बहेलिया था। वह दिन भर अपना जाल लगाकर बांस लिए वन में घूमा करता था और चिड़ियों को फंसाया करता था। एक बार सर्दी के दिनों में बहेलिया बड़े सवेरे जंगल में गया। उस दिन उसे कोई चिड़िया नहीं मिली।  एक जंगल से दूसरे जंगल में भटकते हुए उसे पूरा दिन बीत गया। वह इतनी दूर निकल गया था कि घर  नहीं लौट सकता था। अंधेरा होने पर एक पेड़ के नीचे रात बिता देने के विचार से वह बैठ गया।

उस दिन दिन में वर्षा हुई थी, ओले पड़े थे। सर्दी खूब बढ़ गई थी। बहेलिये के पास कपड़े नहीं थे। वह जंगल में रात बिताने की बात सोच कर घर से नहीं चला था। हवा जोरों से चलने लगी थी, बहेलिया थर थर कांपने लगा। जाड़े के मारे उसके दांत कट कट बजने लगे।

जिस पेड़ के नीचे बहेलिया बैठा था, उस पेड़ के ऊपर कबूतर का एक जोड़ा घोसला बनाकर रहता था। बहेलिए की दुर्दशा देखकर कबूतर ने अपनी कबूतरी से कहा- ‘यह हम लोगों का शत्रु है, किंतु आज हमारे यहां अतिथि की तरह आया हुआ है। इसकी सेवा करना हम लोगों का धर्म है। अभी तो रात प्रारंभ हुई है जाड़ा तो अभी और बढ़ेगा।’

यदि इसे ऐसे ही रहना पड़ा तो रात भर में यह जाड़े के मारे मर जाएगा। हम लोगों को इसकी मृत्यु का पाप लगेगा, हमे इसका जाड़ा दूर करने का उपाय करना चाहिए। Atithi Satkar 

आपस में विचार कर कबूतरी और कबूतर ने अपना घोंसला नीचे गिरा दिया। थोड़े और तिनके अपनी चोंच में दबा-दबा कर वहीं पर दोनों गिराने लगे, फिर कबूतरी उड़ गई और दूर कहीं से एक जलती लकड़ी चोंच में पकड़ कर ले आई। वह लकड़ी उसने तिनको पर डाल दी, लकड़ी में आग होने के कारण तिनके जलने लगे। आग को देखकर बहेलिए ने भी आसपास से लकड़ियां इकट्ठा कर आग में डालना शुरू कर दी जिससे उसका जाड़ा दूर हो गया।

बहेलिया दिन भर का भूखा था। अब वह अग्नि के प्रकाश में इधर-उधर देखने लगा कि कहीं कुछ मिल जाए तो खाकर भूख मिटाई जाए। उसका मुख भूख से सूख रहा था। कबूतरी ने यह देखा तो वह कबूतर से बोली – ‘अतिथि तो साक्षात भगवान का स्वरूप होता है,Atithi Satkar  जिसके घर से अतिथि भूखा चला जाए सब पुण्य नष्ट हो जाते हैं। यह बहेलिया आज हम लोगों का अतिथि है भूखा भी है अर्थात इसकी भूख मिटाने के लिए कुछ करना चाहिए।’ 

कबूतरी के मन में एक युक्ति सूझी उसने कबूतर से कहा-‘ हमारे पास इसकी भूख मिटाने के लिए कुछ भी नहीं है मैं इस जलती आग में कूदती हूं, जिससे यह मेरा मांस खाकर अपना पेट भर लेगा।’ इतना कहते हुए कबूतरी उस जलती हुई आग में कूद पड़ी।

कबूतर ने अपने मन में कहा-‘ इस अतिथि का पेट कबूतरी के थोड़े से मांस से कैसे भरेगा ! मैं भी आग में कूद कर अपना मांस इसे दूंगा और यह कहते हुए कबूतर भी उस जलती हुई आग में कूद पड़ा।’   

उसी समय आकाश में बाजे बजने लगे, चारों तरफ फूलों की वर्षा होने लगी देवताओं का विमान उतरा और उस में बैठकर देवताओं के समान रूप धारण करके कबूतर और कबूतरी उस दिव्यलोक को चले गए जहां बड़े-बड़े यज्ञ करने वाले राजा तथा बड़े-बड़े ऋषि मुनि भी बड़ी कठिनाई से पहुंच पाते हैं। Atithi Satkar 

शिक्षा: अतिथि साक्षात भगवान का रूप माना जाता है,हमें सदा अतिथि का सत्कार करना चाहिए।

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