Ashtawakra ki Kahani in Hindi – बालक अष्टावक्र की रोचक कहानी

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Ashtawakra ki Kahani in Hindi 
Ashtawakra ki Kahani in Hindi 

भारत भूमि प्राचीन काल से सदा ही अनेको बुद्धिमानो से सुसज्जित रही ही भारत भूमि से एक से बढ़कर एक बुद्धिमान पैदा हुए है ऐसे ही एक बुद्धिमान बालक Ashtawakra ki Kahani in Hindi – बालक अष्टावक्र की रोचक कहानी आज मै आपके लिए लेकर आया हूँ। 

कहानी है मिथिला नरेश राजा जनक और बालक अष्टावक्र की, कहानी के अनुसार राजा जनक अक्सर अपने राज दरबार में शास्त्रार्थ कराया करते थे तो बालक अष्टावक्र भी एक दिन शास्त्रार्थ करने जाते है और एक से बढ़कर एक विद्वान पंडितो को शास्त्रार्थ में पराजित कर देते है उसके बाद कहानी में क्या होता है आइये विस्तार से कहानी के बारे में जानते है:-

Ashtawakra ki Kahani in Hindi – बालक अष्टावक्र की रोचक कहानी

वैदिक युग में देवल नाम के एक अत्यंत ज्ञानी ऋषि हुए हैं। जन्म से ही इनके शरीर के आठ अंग ठेढ़े थे, इसी कारण इनका नाम अष्टावक्र पड़ा। इनके नाना वेदों के प्रकाण्ड पंडित थे। इनके पिता कहोड़ भी उत्कट विद्वान थे।

उस काल में मिथिला ज्ञान का केन्द्र थी। मिथिला के राजा जनक दरबार में शास्त्रार्थ कराया करते थे। ‘वन्दी ‘ छद्य नाम से एक विद्वान हारने वाले को नदी में डुबो देता था। वह बड़ा क्रूर था। कहोड़ अर्थ की लालसा में घर से निकले फिर लौट कर ही नहीं आए। Ashtawakra ki Kahani in Hindi 

बड़ा होने पर अष्टावक्र पिता को खोजने चला। मिथिला में अश्वारोही सैनिकों ने अष्टावक्र को राजपथ पर रोका। राजा जनक की सवारी उधर से जा रही थी। अष्टावक्र ने कहा , “लगता है तुम्हारा राजा भी नीतिवान नहीं है ।”

तभी जनक का रथ वहाँ आया। अष्टावक्र बोला राजन, “वृद्ध, अपाहिज, ज्ञानी, रोगी, शव और बालक के लिए मार्ग छोड़ देना चाहिए। 

“तुम इनमें से कौन हो ? ” राजा जनक ने पूछा।

अष्टावक्र बोला । “मैं अशक्त, बालक और ज्ञानी हूँ ।”

Ashtawakra ki Kahani in Hindi  “तुम्हारे लिए मैं राजमार्ग छोड़ रहा हूँ, ”कहकर राजा जनक चले गए। लेकिन बालक अष्टावक्र के उत्तर से राजा जनक बहुत प्रसन्न हुए।

अष्टावक्र धीरे-धीरे यज्ञशाला के द्वार पर पहुँचे। द्वारपाल ने उन्हें रोका और कहा, “राजा से केवल वृद्ध, ब्राह्मण और विद्वान ही मिल सकते हैं। अष्टावक्र कहने लगे, “मैं शास्त्रज्ञ हूँ और वन्दी से शास्त्रार्थ करने आया हूँ। ”बालक की निर्भयता देख द्वारपाल उन्हें अन्दर राजा जनक के पास ले गया।

अष्टावक्र की विद्वता, तर्कशक्ति और निडरता देख कर राजा जनक ने वन्दी से शास्त्रार्थ करने की अनुमति दे दी। हारने पर जल डुबो दिए जाने की बात भी चला दी। वन्दी बोले, “अष्टावक्र, तुम बालक हो प्रश्न करो ।”

अष्टावक्र, “हम अंकों का शास्त्रार्थ करेंगे – एक ब्रहा” वन्दी ने उत्तर दिया, “ब्रह्म और आत्मा, दो। ”अष्टावक्र बोले, “पृथ्वी, आकाश और पाताल; स्वप्न, जागृति और सुप्राप्ति, रजस् और तमस्, जीव, जगत और ब्रह्म – तीन। Ashtawakra ki Kahani in Hindi 

“वन्दी ने कहा- दिशाएं चार वन्दी जन के उत्तर में अष्टावक्र बोले- पृथ्वी , जल , वायु और आकाश – महाभूत पाँच। अष्टावक्र के उत्तर में वन्दी ने कहा , “अहंकार, मोह, क्रोध, लोभ, काम और मत्सर शत्रु छः। 

इस प्रकार तेरह पर वन्दी अटक गए। उनके माथे पर खेद की बूँद झलकने लगीं। राजा जनक ने वन्दी को पराजित और अष्टावक्र को सभा के मध्य विजयी घोषित किया राजा जनक कहने लगे, “अष्टावक्र वन्दी पराजित हो गए हैं।

अब इनका जीवन तुम्हारे हाथ में है। “अष्टावक्र ने तिरस्कार की नदी में वन्दी को डुबो दिया। Ashtawakra ki Kahani in Hindi वन्दी, वरुण लोक का राजकुमार था। वह ‘वन्दी’ नाम से राजा जनक के दरबार में भारतीय प्रतिभाओं को छल, बल तथा वाक् कौशल से परास्त कर वरुण लोक समुद्र के मार्ग से जलयानों में भेज दिया करता था।

प्रतिभा का पलायन इस प्रकार उस काल में होता था। अष्टावक्र ने आज अपनी विलक्षण प्रतिभा और बुद्धि कौशल से न केवल अपने कहोड़ को पुनः प्राप्त किया वरन् पण्डितों को भी जीवन दान दिया।

 वे सभी अपने देश लौटे आए। प्रभावित होकर राजा जनक ने अष्टावक्र से वहीं मिथिला में रहने व राजपंडित का पद सुशोभित करने का आग्रह किया पर वे न माने और चरैवेति – चरैवेति कहते हुए वहाँ से चले गए। Ashtawakra ki Kahani in Hindi 

 

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