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2 Gadhho ki Kahani in Hindi – दो गधो की रोचक कहानी

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2 Gadhho ki Kahani in Hindi
2 Gadhho ki Kahani in Hindi

दोस्तों कहते है की एक ऐसा जानवर है जो समझदारी का भी काम करे फिर भी उसे गधा ही कहा जायेगा और वह जानवर है स्वयं गधा और आज मैं आपको एक नही बल्कि 2 Gadhho ki Kahani in Hindi – दो गधो की रोचक कहानी के बारे में बताने हा रहा हूँ।

आज की कहानी में एक व्यक्ति के पास दो गधे होते है और वह उन गधो से ही अपने कार्य को करता था लेकिन एक गधा मर जाता है कारण क्या है वह कहानी में जानते है और तभी से कहानी में कुछ रोचक मोड़ आता है चलिए कहानी को विस्तार से जानते है कि पूरी कहानी क्या है?

2 Gadhho ki Kahani in Hindi – दो गधो की रोचक कहानी

एक व्यापारी के पास दो गधे  थे । वह उन पर सामान लाद कर पहाड़ों पर बसे गाँव में ले जाकर बेचा करता था । एक बार उनमें से एक गधा कुछ बीमार हो गया । व्यापारी को पता नहीं था कि उसका एक गधा बीमार हो चुका है ।

असल में पिछले दिनों हुई बारिश में वह भीग गया था और मौसम में हुए बदलाव के कारण उसकी तबियत खराब होती चली गयी । 2 Gadhho ki Kahani in Hindi

एक दिन वह व्यापारी उन दोनों गधो को लेकर गाँव में नमक , गुड़ , दाल , चावल आदि बेचने के लिये ले जाने वाला था । उसने दोनों गधो पर बराबर – बराबर सामान लाद लिया और चल पड़ा ।

ऊँचे – नीचे पहाड़ी रास्ते पर चलने में बीमार गधे को बहुत कष्ट होने लगा । बीमारी की दशा में वह चलने में असमर्थ था लेकिन उसकी हालत के बारे में व्यापारी को नहीं पता था कि गधा बीमार है ।

पहले गधे ने अपने साथी दूसरे गधे  से कहा- ‘पिछले कुछ दिनों से मेरी तबीयत ठीक नहीं है। क्या तुम मेरी कुछ मदद कर सकते हो?

2 Gadhho ki Kahani in Hindi साथी गधे ने कहा- ‘भला मैं तुम्हारी क्या मदद कर सकता हूँ मैं भी तुम्हारी तरह ही एक ही जगह बंधा रहता हूँ और मैं तुम्हारी क्या मदद करूँ?

पहले गधे ने कहा – ‘मैं अपनी पीठ पर रखा एक बोरा गिरा देता हूँ , तुम यहीं खड़े रहो । हमारा स्वामी वह बोरा तुम्हारे ऊपर रख देगा । मेरा भार कुछ कम हो जायगा तो मैं तुम्हारे साथ चला चलूँगा ।‘ तुम आगे चले जाओगे तो गिरा बोरा फिर मेरी पीठ पर रखा जायगा । ‘

दूसरा गधे  बोला- ‘ भला मैं तुम्हारा भार ढोने के लिये क्यों खड़ा रहूँ ? मेरी पीठ पर क्या कम भार लदा है ? मैं अपने हिस्से का ही भार ढोऊँगा ।

‘ बीमार गधा चुप हो गया । लेकिन धीरे धीरे उसकी तबीयत अधिक खराब हो रही थी । चलते समय एक पत्थर के टुकड़े से ठोकर खाकर वह गिर पड़ा और लुढ़कता हुआ पहाड़ से नीचे खाई में गिर गया । 2 Gadhho ki Kahani in Hindi

व्यापारी अपने एक गधे के मर जाने से बहुत दुखी हुआ और रोने लगा । वह थोड़ी देर वहाँ खड़ा रहा । फिर उसने उस पहले गधे के गिरे हुए बोरे भी दूसरे गधे  की पीठ पर लाद दिये।

अब तो वह पहला गधा पछताने लगा और मन – ही – मन कहने लगा- ‘ यदि मैं अपने साथी का कहना मानकर उसका एक बोरा ले लेता तो यह सब भार मुझे क्यों ढोना पड़ता । ‘ संकट में पड़े अपने साथी की जो सहायता नहीं करते उन्हें पीछे पछताना ही पड़ता है। 2 Gadhho ki Kahani in Hindi

 

Shree Ram ki Kahani in Hindi – जब वसिष्ठ को मिलाया गुह से

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Shree Ram ki Kahani in Hindi 
Shree Ram ki Kahani in Hindi 

भारत भूमि मर्यादा पुरुषोत्तम, सत्यवादी, कर्मनिष्ठ और प्रजा के लिए हमेशा भला सोचने वाले राजा श्री राम जी जैसे महान राजा के लिए सदा धन्य रहेगी।  आज मैं आपको Shree Ram ki Kahani in Hindi के बारे में बताने वाला हूँ जब श्री राम जी ने अपने गुरु वसिष्ठ को मिलाया गुह से।

अब आप यह सोच रहे होंगे यह गुह कौन था और श्री राम जी ने उसे अपने गुरु वसिष्ठ से क्यों मिलाया ? क्या कारण था कि श्री राम जी को स्वयं उसे वसिष्ठ जी से मिलाना पड़ा चलिए इस कहानी को विस्तार से जानते है…

Shree Ram ki Kahani in Hindi – जब वसिष्ठ को मिलाया गुह से

श्री राम का चरित्र इस देश की संस्कृति का प्राण है । उसका एक छोर मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप है तो दूसरा छोर दीन – बन्धु स्वरूप है । अत्याचारी रावण के लंका से गंगा तक फैले हुए राक्षसी प्रभाव को अपने अद्भुत संगठन कौशल के बल पर वानर , भालू एवं रीक्ष जैसी वन्य जातियों के संगठन से नष्ट कर समूचे देश में एक नवीन चेतना , आत्म विश्वास एवं सुरक्षा का भाव उत्पन्न किया ।

अहिल्या उद्धार , निषाद मिलन एवं शबरी के जूठे बेर खाकर जहाँ राम ने सामाजिक प्रतिष्ठा , समता एवं स्नेह की सीमाओं को तंग घेरे में से निकाल कर एक नया अर्थ एवं स्वरूप प्रदान किया । Shree Ram ki Kahani in Hindi

जब बात स्वयं के ऊपर आई तो प्रचारंजन के उच्च आदर्शों की रक्षा हेतु सीता जैसी साध्वी के परित्याग में भी पीछे नहीं हटे । इसी कारण उनका दिव्य चरित्र युग – युग से देश को दिशा दे रहा है और भविष्य में भी देता रहेगा । यहाँ प्रस्तुत है उनके प्रेम का एक अनूठा प्रसंग ।

चित्रकूट में भरत और शत्रुघ्न को श्रीराम के पास लाकर गुह ने कहा , ” भगवन ! मुनिवर वसिष्ठ , तीनों माताएँ , नगरवासी , सेवक , सेनापति , मंत्री आदि भी दर्शनों की प्रतीक्षा में हैं । ” श्री राम यह सुन तुरन्त उठ खड़े हुए और शत्रुघ्न को वहाँ सीता के पास छोड़कर लक्ष्मण , भरत और गुह के साथ अयोध्या के समाज के स्वागत करने के लिए चले ।

बन्धु गुरु सर्वप्रथम श्री राम ने गुरु वसिष्ठ जी के श्री चरणों की रज मस्तक पर लगा कर प्रणाम किया । गुरुदेव ने उन्हें आर्शीवाद दिया । श्री राम प्रत्येक से मिले ।

Shree Ram ki Kahani in Hindi  गुह की भी वसिष्ठ के चरण स्पर्श करने की उत्कट इच्छा थी , पर वसिष्ठ जी में छुआछूत का भेद है । वे गुह को छूते नहीं हैं । गुरु जी को कष्ट न हो , उन्हें बुरा न लगे , इसलिए उसने दूर से ही प्रणाम करके कहा , “ महाराज , मैं श्रृंगवेदपुर का भील हूँ ।

” वसिष्ठ जी ने दूर से ही उसे आशीर्वाद दिया ।

श्री राम को यह अच्छा न लगा । उन्होंने सोचा यदि गुरुदेव भील को गले नहीं लगायेंगे तो फिर राम राज्य कैसे आयेगा । उनकी इच्छा थी कि गुरुदेव गुह को गले लगाएँ । पर वे स्वयं गुरुदेव से यह तो नहीं कह सकते थे कि आप भूल कर रहे हैं । उन्होंने एक युक्ति सोची । Shree Ram ki Kahani in Hindi

गुह का हाथ पकड़कर वे वसिष्ठ जी के पास जाकर बोले , ” गुरुदेव , आपने इसे पहिचाना । यह मेरा मित्र है । ‘ वसिष्ठ जी श्री राम का अभिप्राय समझ गए ।

गुरु वसिष्ठ ने राम सखा मानकर गुह को गले लगाया । गुह और वसिष्ठ जी को गले मिलते देखकर राम जी की आँखों में हर्ष के आँसू आ गए ।

आकाश से देवताओं ने पुष्प वृष्टि की । श्री राम जी सेतु बन गए । उन्होंने दोनों किनारों को मिला दिया । यह कोई सामान्य बात नहीं थी । वस्तुतः यह एक क्रान्ति थी ।

तुलसीदास जी ने लिखा है कि जब भरत – राम मिले तो देवताओं ने पुष्प वृष्टि की । कारण स्पष्ट है । श्री राम – भरत मिलना सहज है , स्वाभाविक है पर गुह , एक भील और वसिष्ठ जैसे मंत्रदृष्टा का मिलन सच में एक क्रान्ति है । राम राज्य की आधारशिला है । Shree Ram ki Kahani in Hindi

 

Yudhishtir ki kahani in Hindi – महान युधिष्ठिर की कथा

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Yudhishtir ki kahani in Hindi
Yudhishtir ki kahani in Hindi

दोस्तों महाभारत में पांड्वो और कौरवो के बीच बहुत बड़ा महासंग्राम हुआ था जिसे आज पूरी दुनिया जानती है और महाभारत में एक से बढ़कर एक महारथी थे जिसमे एक थे युधिष्ठिर तो आज Yudhishtir ki kahani in Hindi – महान युधिष्ठिर की कथा आपको सुनाने जा रहा हूँ।

जहाँ युधिष्ठिर ने महाभारत जैसे महासंग्राम के शुरू होने से पहले कुछ ऐसा किया था जिसे देख कौरवो के होश उड़ गये थे। ऐसा क्या हुआ था उस रणभूमि में के सभी चकित रह गये थे चलिए कहानी के माध्यम से विस्तार से जानते है:

Yudhishtir ki kahani in Hindi – महान युधिष्ठिर की कथा

पाँचों पाण्डवों में युधिष्ठर सबसे बड़े थे । वे धर्म एवं सत्य की साक्षात् मुर्ति थे । शत्रु भी इनके  गुणों की सराहना करते थे । हस्तिनापुर आकर उन्होंने समस्त हस्तिनापुर वासियों को अपने श्रेष्ठ व्यवहार एवं शान्त स्वभाव से आकर्षित कर लिया था ।

अपने पराक्रमी भाइयों के बल पर बड़े – बड़े गण राज्यों को जीत कर उन्होंने राजसूय यज्ञ किया उस यज्ञ में राजाओं ने इन्हें प्रचुर धन – दौलत भेंट की । Yudhishtir ki kahani in Hindi

कौरवों में ज्येष्ठ दुर्योधन ईर्ष्या से जल उठा और परिणामतः सर्वनाशी महाभारत का महासमर हुआ । युधिष्ठिर के पक्ष में श्रीकृष्ण तथा सात अक्षोहिणी सेना थी । उधर कौरवों के पक्ष में अनेक महारथी , पूरी यादव सेना और अन्य असंख्य सैन्य बल था ।

कहा जाता है कि सत्य के प्रभाव से ही इनका रथ पृथ्वी से ऊपर उठकर चलता था । महाभारत के युद्ध में ‘ अश्वत्थाम हतो , नरो वा मुँजरो वा ‘ कहने पर और वह भी श्रीकृष्ण के समझाने पर ही यह असत्य को सत्य का बाना पहिनाने को तैयार हुए ।

महाभारत युद्ध में विजय प्राप्ति के बाद , अनेक वर्षों तक राज्य कर ये सशरीर स्वर्ग सिधारे। यहाँ इन के शील के बारे में एक रोचक प्रसंग प्रस्तुत कर रहे हैं ।

Yudhishtir ki kahani in Hindi  श्रीकृष्ण सन्धि प्रस्ताव लेकर हस्तिानापुर गए । वह प्रत्येक दशा में युद्ध को टालना चाहते थे। उन्होंने सभा में यहाँ तक कहा कि पाण्डव पाँच गाँव लेकर ही सन्तुष्ट हो जाएंगे ।

पर दुष्ट दुर्बुद्धि दुर्योधन ने इसे पाण्डवों की कमजोरी समझा और कहा कि वह उन्हें सुई की नोक के बराबर भूमि भी नहीं देगा । इसके विपरीत उसने श्रीकृष्ण का अपमान किया । वह उन्हें बन्दी बनाने को आगे बढ़ा ।

तब विवश होकर श्रीकृष्ण ने वहाँ अपना विकराल स्वरूप प्रदर्शित किया । उस प्रकाशपुंज को अन्धे धृतराष्ट्र ने भी देखा वे सब हतप्रभ रह गए । श्रीकृष्ण निराश लौट आए ।

कुन्ती ने श्रीकृष्ण को चलते समय कहा था कि वह समय आ गया है जिस दिन के लिए क्षत्राणियाँ बालों की लाज गर्भ धारण करती हैं ।

द्रोपदी ने कहा था ‘ भैया ( बालों को दिखाकर ) इनकी लाज रखना । ” युद्ध की तैयारियाँ शुरू हुई । दोनों सेनाएँ कुरुक्षेत्र के मैदान में आमने – सामने खड़ी हुईं ।

अर्जुन बोले , ‘ श्रीकृष्ण मेरा रथ के दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा करो । मैं युद्ध की इच्छा रखने वालों ( कौरवों ) के दल को देखना चाहता हूँ । Yudhishtir ki kahani in Hindi

उसी समय श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया और उसका व्यामोह दूर किया । युद्ध की घोषणा हुई । तभी यकायक युधिष्ठिर रथ से उतर कर पैदल ही निःशस्त्र कौरव ” सेना की ओर जाने लगे ।

लोगों ने सोचा कि पाण्डवों ने डर कर हार स्वीकार कर ली । लेकिन ऐसा नहीं था ।

युधिष्ठिर भीष्म पितामह के रथ के सामने हाथ जोड़ कर खड़े हो गए और उनसे युद्ध प्रारम्भ करने की स्वीकृति माँगी । साथ उन्होंने उनका आशीर्वाद भी मांगा भीष्म पितामह प्रसन्न हो उठे और उन्होंने उन्हें विजय का आशीर्वाद दिया ।

इसी प्रकार क्रमशः द्रोणाचार्य ( गुरुवर ) , कृपाचार्य से भी उन्होंने रण करने की स्वीकृति और आशीर्वाद माँगा जो उन्होंने प्रसन्न हो दिया ।Yudhishtir ki kahani in Hindi

इस प्रकार का शील था- युधिष्ठिर का युद्ध के समय के भीषण क्षणों में भी जो शिष्ट परम्परा को नहीं भूले । यही कारण था कि वे दुर्योधन को भी सुयोधन कहकर पुकारते और उसे सम्मान देते थे ।

Lalchi Raja Ki kahani in Hindi – लालची राजा की कहानी

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Lalchi Raja Ki kahani in Hindi
Lalchi Raja Ki kahani in Hindi

दोस्तों लालच बुरी बला है यह कहावत बिलकुल सच है कुछ इस आधार पर ही आज की हमारी कहानी भी आधारित है Lalchi Raja Ki kahani in Hindi – लालची राजा की कहानी जिसमे लालच के कारण एक राजा को कुछ ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है जब वह अपनी बेटी और खाने पीने इत्यादी सभी प्रकार की वस्तुओं से भी दूर हो जाता है और आखिर क्या है पूरा माजरा चलिए कहानी को विस्तार से जानते है।

Lalchi Raja Ki kahani in Hindi – लालची राजा की कहानी

यूरोप में यूनान नाम का एक देश है । यूनान में पुराने समय में मीदास नाम का एक राजा राज्य करता था । राजा मीदास बड़ा ही लालची था ।

अपनी पुत्री को  छोड़कर उसे दूसरी कोई वस्तु संसार में प्यारी थी तो बस सोना ही प्यारा था ।वह रात में सोते – सोते भी सोना इकट्ठा करने का स्वप्न देखा करता था ।

एक दिन राजा मीदास अपने खजाने में बैठा सोने की ईंटें और अशर्फियाँ गिन रहा था । अचानक वहाँ एक देवदूत आया ।

उसने राजा से कहा- ‘ मीदास ! तुम बहुत धनी हो । ‘ मीदास ने मुँह लटकाकर उत्तर दिया- ‘ मैं धनी कहाँ हूँ । मेरे पास तो यह बहुत थोड़ा सोना है । Lalchi Raja Ki kahani in Hindi

‘ देवदूत बोला- ‘ तुम्हें इतने सोने से भी संतोष नहीं ? कितना सोना चाहिये तुम्हें ?

” राजा ने कहा- ‘ मैं तो चाहता हूँ कि मैं जिस वस्तु को  हाथ से स्पर्श करू वही सोने की हो जाय ।

‘ देवदूत हँसा और बोला— ‘ अच्छी बात ! कल सबेरे से तुम जिस वस्तु को छुओगे , वही सोने की हो जायगी ।

‘ उस देवदूत की बात सुनकर रात में राजा मीदास को नींद नहीं आयी । बड़े सबेरे वह उठा।

उसने एक कुर्सी पर हाथ रखा , वह सोने की हो गयी । एक मेज को छुआ , वह सोने की बन गयी । राजा मीदास प्रसन्नता के मारे उछलने और नाचने लगा । वह पागलों की भाँति दौड़ता हुआ अपने बगीचे में गया और पेड़ों को छूने लगा ।

Lalchi Raja Ki kahani in Hindi उसने फूल , पत्ते , डालियाँ , गमले छुए । सब सोने के हो गये । सब चमाचम चमकने लगे । मीदास के पास सोने का पार नहीं रहा । दौड़ते – उछलते मीदास थक गया । उसे अभी तक यह पता ही नहीं लगा था कि उसके कपड़े भी सोने के होकर बहुत भारी हो गये हैं । वह प्यासा था और भूख भी उसे लगी थी ।

बगीचे से अपने राजमहल लौटकर एक सोने की कुर्सी पर वह बैठ गया । एक नौकर ने उसके आगे भोजन और पानी लाकर रख दिया । लेकिन जैसे ही मीदास ने भोजन को हाथ लगाया , सब भोजन सोना बन गया । उसने पानी पीने के लिये गिलास उठाया तो गिलास और पानी सोना हो गया ।

मीदास के सामने सोने की रोटियाँ , सोने के चावल , सोने के आलू आदि रखे थे और वह भूखा था , प्यासा था । सोना चबाकर उसकी भूख नहीं मिट सकती थी । मीदास रो पड़ा ।

उसी समय उसकी पुत्री खेलते हुए वहाँ आयी । अपने पिता को रोते देख वह पिता की गोद में चढ़कर उसके आँसू पोंछने लगी । मीदास ने पुत्री को अपनी छाती से लगा लिया । Lalchi Raja Ki kahani in Hindi

लेकिन अब उसकी पुत्री वहाँ कहाँ थी । मीदास की गोद में तो उसकी पुत्री की सोने की इतनी वजनी मूर्ति थी कि उसे वह गोद में उठाये भी नहीं रख सकता था । बेचारा मीदास सिर पीट – पीटकर रोने लगा ।

देवदूत को दया आ गयी । वह फिर प्रकट हुआ उसे देखते ही मीदास उसके पैरों पर गिर पड़ा और गिड़गिड़ा कर प्रार्थना करने लगा- आप अपना वरदान वापस लौटा लीजिये । ‘

देवदूत ने पूछा- ‘ मीदास ! अब तुम्हे सोना नहीं चाहिये ? टुकड़ा रोटी भली या सोना ? ‘ बताओ तो एक गिलास पानी मूल्यवान् है या सोना ? एक टुकड़ा रोटी भली या सोना?

मीदास ने हाथ जोड़कर कहा – ‘ मुझे सोना नहीं चाहिये । मैं जान गया कि मनुष्य को सोना नहीं चाहिये । सोने के बिना मनुष्य का कोई काम नहीं अटकता ; किंतु एक गिलास पानी और एक टुकड़े रोटी के बिना मनुष्य का काम नहीं चल सकता । Lalchi Raja Ki kahani in Hindi अब सोने का लोभ कभी नहीं करूँगा ।

‘ देवदूत ने एक कटोरे में जल दिया और कहा – ‘ इसे सबपर छिड़क दो ।

मीदास ने वह जल अपनी पुत्री पर , मेज पर , कुर्सी पर , भोजन पर , पानी पर और बगीचे के पेड़ों पर छिड़क दिया । सब पदार्थ जैसे पहले थे , वैसे ही हो गये ।

2 Kisano Ki kahani in Hindi – दो किसानो की शिक्षाप्रद कहानी

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2 Kisano Ki kahani in Hindi
2 Kisano Ki kahani in Hindi

दोस्तों कहते है सरलता और शांत स्वभाव से आप किसी भी व्यक्ति का दिल जीत सकते है 2 Kisano Ki kahani in Hindi – दो किसानो की कहानी जो आज की हमारी कहानी का शीर्षक है और आज की हमारी कहानी भी कुछ इसी बात पर आधारित है।

कहानी में एक किसान बड़े ही अभिमान और घमंड स्वभाव का होता ही लेकिन दूसरी तरफ दूसरा किसान बिलकुल सरल और शांत स्वभाव का होता है लेकिन सरल स्वभाव वाले किसान ने ऐसा क्या किया की अभिमानी और घमंडी किसान भी उसकी बात मानने लगता है और उसकी ही तरह सरल और शांत स्वभाव का हो जाता  है । 2 Kisano Ki kahani in Hindi

2 Kisano Ki kahani in Hindi – दो किसानो की कहानी

एक गाँव में एक किसान रहता था । उसका नाम था शेर सिंह । शेर सिंह शेर – जैसा भयंकर और अभिमानी था । वह थोड़ी – सी बात पर बिगड़कर लड़ाई कर लेता था । गाँव के लोगों से सीधे मुँह बात नहीं करता था । न तो वह किसी के घर जाता था और न रास्ते में मिलने पर किसी को प्रणाम करता था ।

गाँव के अन्य किसान भी उसे अहंकारी समझकर उससे नहीं बोलते थे । उसी गाँव में एक दयाराम नाम का किसान आकर बस गया । वह बहुत सीधा और भला आदमी था । सबसे नम्रता से बोलता था । सबकी कुछ – न – कुछ सहायता किया करता था । 2 Kisano Ki kahani in Hindi

सभी किसान उसका आदर करते थे और अपने कामों में उससे सलाह लिया करते थे । गाँव के किसानों ने दयाराम से कहा – ‘ भाई दयाराम ! तुम कभी शेर सिंह के घर मत जाना । उससे दूर ही रहना । वह बहुत झगड़ालू है ।

दयाराम ने हँस कर कहा- ‘ शेर सिंह ने मुझसे झगड़ा किया तो मैं उसे मार ही डालूँगा । दूसरे किसान उसकी बात सुनकर हँस पड़े । वे जानते थे कि दयाराम बहुत दयालु है । वह किसी को मारना दूर , किसी को गाली तक  नहीं दे सकता । लेकिन यह बात किसी ने शेर सिंह से कह दी ।

शेर सिंह क्रोध से लाल हो गया । वह उसी दिन से दयाराम से झगड़ने की चेष्टा करने लगा । उसने दयाराम के खेत में अपने बैल छोड़ दिये । 2 Kisano Ki kahani in Hindi बैल बहुत – सा खेत चर गये ; किंतु दयाराम उन्हें चुपचाप खेत से हाँक दिया । शेर सिंह ने दयाराम के खेत में जाने वाली पानी की नाली तोड़ दी । पानी बहने लगा । दयाराम ने आकर चुपचाप नाली बाँध दी ।

इसी प्रकार शेर सिंह बराबर दयाराम की हानि करता रहा ; किंतु दयाराम ने एक बार भी उसे झगड़ने का अवसर नहीं दिया ।

एक दिन दयाराम के यहाँ उनके सम्बन्धी ने लखनऊ के मीठे खरबूजे भेजे । दयाराम ने सभी किसानों के घर एक – एक खरबूजा भेज दिया ; लेकिन शेर सिंह ने उसका खरबूजा यह कहकर लोटा दिया कि ‘ मैं भिखमंगा नहीं हूँ । मैं दूसरों का दान नहीं लेता ।

धीरे धीरे कुछ महीने बीत गये बरसात का मौसम आ गया ।

एक दिन शेर सिंह अपनी गाड़ी में अनाज भरकर दूसरे गाँव से आ रहा था । 2 Kisano Ki kahani in Hindi रास्ते में एक नाले के कीचड़ में उसकी गाड़ी फँस गयी । शेर सिंह के बैल दुबले थे । वे गाड़ी को कीचड़ में से निकाल नहीं सके ।

जब गाँव में इस बात की खबर पहुँची तो सब लोग बोले- ‘ शेर सिंह बड़ा दुष्ट है । उसे रात भर नाले में पड़े रहने दो । ‘ लेकिन दयाराम ने अपने बलवान् बैल पकड़े और नाले की ओर चल पड़ा ।

लोगों ने उसे रोका और कहा – ‘ दयाराम ! शेर सिंह ने तुम्हारी बहुत हानि की है । तुम तो कहते थे कि मुझसे लड़ेगा तो उसे मार ही डालूँगा । फिर तुम आज उसकी सहायता करने क्यों जाते हो ? ”

दयाराम बोला— ‘ मैं आज सचमुच उसे मार डालूँगा । तुम लोग सबेरे उसे देखना ।’

2 Kisano Ki kahani in Hindi  ‘ जब शेर सिंह ने दयाराम को बैल लेकर आते देखा तो गर्व से बोला – ‘ तुम अपने बैल लेकर लौट जाओ । मुझे किसी की सहायता नहीं चाहिये ।

” दयाराम ने कहा – ‘ तुम्हारे मन में आवे तो गाली दो , मन में आवे मुझे मारो, इस समय तुम संकट में हो । तुम्हारी गाड़ी फँसी है और रात होने वाली है । मैं तुम्हारी बात इस समय नहीं मान सकता ।

दयाराम ने शेर सिंह के बैलों को खोलकर अपने बैलगाड़ी में जोत दिये । उसके बलवान् बैलों ने गाड़ी को खींचकर नाले से बाहर कर दिया । शेर सिंह गाड़ी लेकर घर आ गया ।

उसका दुष्ट स्वभाव उसी दिन से बदल गया । वह कहता था- -‘दयाराम ने अपने उपकार के द्वारा मुझे मार ही दिया । अब मैं वह अहंकारी शेर सिंह कहाँ रहा ।

‘ अब वह सबसे नम्रता और प्रेम का व्यवहार करने लगा । बुराई को भलाई से जीतना ही सच्ची जीत है । दयाराम ने सच्ची जीत पायी । 2 Kisano Ki kahani in Hindi